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Tuesday, 13 October 2020
Friday, 19 January 2018
हाईकोर्ट का भाजपा सरकार को दिया करारा झटका अटल सेवा केन्द्र फिर से होंगे राजीव गांधी सेवा केन्द्र,
हाईकोर्ट का भाजपा सरकार को दिया करारा झटका
अटल सेवा केन्द्र फिर से होंगे राजीव गांधी सेवा केन्द्र,
पूर्व मुख्यमंत्री ने किया उच्च न्यायालय के निर्णय का स्वागत
जयपुर। कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव एवं पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने भाजपा के सरकार में आते ही राजीव गांधी सेवा केन्द्रों का नाम बदलकर अटल सेवा केन्द्र करने के निर्णय को निरस्त कर पुन: राजीव गांधी सेवा केन्द्र करने के राजस्थान उच्च न्यायालय के निर्णय का स्वागत किया है।गहलोत ने कहा कि जब-जब भी भाजपा सरकार सत्ता में आई है, इन्होंने विकास करने की बजाय कांग्रेस सरकार के लोकप्रिय कार्यों/योजनाओं का नाम बदलने का काम प्राथमिकता से किया है। पूर्व में भी जब भाजपा सरकार आई थी तो जयपुर के राजीव गांधी शिक्षा संकुल का नाम बदल दिया था जबकि संकुल का शिलान्यास एवं उद्घाटन दोनों राजीव गांधी शिक्षा संकुल के नाम से हुए थे। इसी प्रकार राजीव गांधी स्वर्ण जयंती पाठशालाओं से भी राजीव गांधी का नाम हटा दिया था। इस कार्यकाल में राजीव गांधी सेवा केन्द्रों के अलावा इंदिरा प्रियदर्शिनी योजना, वरिष्ठ नागरिक तीर्थ यात्रा योजना, शुभ लक्ष्मी योजना सहित कई योजनाओं/विश्वविद्यालयों के नाम बदले गये हैं।
पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा कि देश एवं दुनिया में कहीं पर भी देश के लिए त्याग एवं बलिदान करने वाले महापुरूषों के नाम पर रखी गई योजनाओं एवं भवनों के नाम बदलने की परम्परा नहीं है। राजस्थान की मुख्यमंत्री श्रीमती वसुंधरा राजे द्वारा इस प्रकार योजनाओं के नाम बदलना इनकी सोच को दर्शाता है।
उन्होंने कहा कि राजीव गांधी सेवा केन्द्रों के नाम बदलने से लाखों कार्यकर्ताओं में काफी रोष था, अब माननीय उच्च न्यायालय के निर्णय से उन्हें खुशी हुई है।
Friday, 15 December 2017
सुप्रीम कोर्ट ने सत्र अदालत को जमानत देने के राजस्थान हाई कोर्ट के आदेश को रद्द किया; कहा, कोई बड़ी अदालत छोटी अदालत को आदेश पास करने को नहीं कह सकता
सुप्रीम कोर्ट ने सत्र अदालत को जमानत देने के राजस्थान हाई कोर्ट के आदेश को रद्द किया;
कहा, कोई बड़ी अदालत छोटी अदालत को आदेश पास करने को नहीं कह सकता
सुप्रीम कोर्ट ने वृहस्पतिवार को कहा कि कोई भी ऊंची अदालत किसी निचली अदालत को किसी पक्ष द्वारा दायर याचिका पर कोई विशेष फैसला/आदेश देने को नहीं कह सकता। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी अदालत की न्यायिक स्वतंत्रता में कोई कोर्ट, यहाँ तक की ऊंची अदालत भी दखल नहीं दे सकता।
न्यायमूर्ति आरके अग्रवाल और न्यायमूर्ति अभय मनोहर सप्रे ने राजस्थान हाई कोर्ट के आदेश को निरस्त करते हुए उक्त बातें कही। इस आदेश में हाई कोर्ट के एकल जज ने एक अवयस्क को अगवा कर रेप करने के कथित मामले में पुनरीक्षण चाहने वालों से सत्र न्यायालय में नियमित जमानत के लिए पेश होने को कहा और यहाँ तक कि सत्र अदालत को उसी दिन उन लोगों को जमानत दे देने का आदेश दिया।“किसी मामले में फैसला सुनाने को लेकर हर अदालत को न्यायिक स्वतंत्रता मिली हुई है यह एक स्थापित तथ्य है। ऊंची अदालत सहित कोई भी अदालत इसमें दखल नहीं दे सकता।”
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले पर गौर करते हुए कहा, “यहाँ तक कि निचली अदालत को कोई मामला सौंपने पर भी ऊंची अदालत निचली अदालत को जमानत ‘देने’ या ‘नहीं देने’ का निर्देश नहीं दे सकता। अगर इस तरह का कोई निर्देश जारी होता है तो इसका मतलब होगा उस कोर्ट के अधिकार को हथियाना और यह निचली अदालत के स्वनिर्णय के अधिकार में हस्तक्षेप होगा। इस तरह के आदेश, इसलिए, कानूनी रूप से टिक नहीं सकते। कोर्ट ने हाई कोर्ट के आदेश के उस हिस्से को निरस्त कर दिया जिसमें उसने सत्र अदालत को जमानत देने का आदेश दिया था।
न्यायमूर्ति सप्रे ने कहा, “दोनों ही मामलों – जमानत देने या इसे देने से मना करने में, सत्र न्यायाधीश को अपने स्वतंत्र न्यायिक विचार का प्रयोग करने और मामले के तथ्यों को ध्यान में रखते हुए जमानत देने या उससे इनकार करने पर लागू होने वाले वैधानिक सिद्धांतों के अनुरूप फैसला देना होता है। इस मामले में, एकल जज इस वैधानिक सिद्धांत को अपने ध्यान में रखने में चूक गया।”
सुप्रीम कोर्ट ने यह आदेश राजस्थान हाई कोर्ट के अप्रैल 28 के उस आदेश के खिलाफ दायर अपील पर दिया है जिसमें हाई कोर्ट ने आशीष मीणा और विमल मीणा नामक दो लोगों के खिलाफ सत्र अदालत द्वारा जारी गैर जमानती वारंट को निरस्त कर दिया था।
यह मामला 2014 में मदन मोहन द्वारा दायर एक एफआईआर से जुड़ा है। मदन मोहन ने ही सुप्रीम कोर्ट में अपील भी दायर की है।
दो आरोपी विमलेश कुमार और जनक सिंह आईपीसी की धारा 120(B), 363, 366, 368, 370(4) और 376 (पीओसीएसओ अधिनियम की धारा 3/4 और 16/17 के साथ इसे पढ़ें) के तहत मामले दायर किए गए थे। यह मामला सवाई माधोपुर के जिला और सत्र न्यायाधीश के पास लंबित है।
मदन मोहन ने सत्र न्यायालय में आईपीसी की धारा 193 के तहत एक शिकायत दायर की थी। उसने शिकायत की थी कि यद्यपि आशीष मीणा और विमल मीणा का नाम चार्जशीट के साथ दाखिल अन्य सभी दस्तावेजों में प्रमुखता से शामिल है, पर चार्जशीट से उनके नाम गायब थे जबकि विमलेश और जनक सिंह के नाम उसमें बचे रहे जिन पर मुकदमा चला।
उन्होंने अपील की कि आशीष और विमल पर भी मुकदमा चलाया जाए।
सत्र न्यायाधीश ने 19 नवंबर 2016 को उसके आवेदन पर कार्रवाई करते हुए आशीष और विमल को गिरफ्तार करने के लिए उनके खिलाफ गैर जमानती वारंट जारी किया।
आशीष और विमल ने राजस्थान हाई कोर्ट में आपराधिक पुनरीक्षण याचिका दायर की पर मदन मोहन को एक पक्षकार के रूप में अभियोजित किया गया।
उनकी पुनरीक्षण याचिका पर सुनवाई करते हुए हाई कोर्ट ने सत्र अदालत के फैसले के उस हिस्से को निरस्त कर दिया जिसमें उनके खिलाफ गैर जमानती वारंट जारी किया गया था।
इसके बाद हाई कोर्ट ने आशीष और विमल को निर्देश दिया कि वे सुनवाई अदालत में आत्मसमर्पण कर दें और नियमित जमानत के लिए आवेदन करे और जिस पर अदालत उसी दिन गौर करेगा जिस दिन उसके लिए आवेदन किया जाएगा।
इस आदेश के खिलाफ मदन मोहन की अपील पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा, “एकल जज ने न्यायिक विचार को तरजीह दिए बिना यह आदेश दिया और ऐसा करते हुए उसने कम से कम दो भारी गलतियां की।”
कोर्ट ने कहा, “पहला, वह यह नहीं देख पाया कि जिस व्यक्ति की शिकायत पर सेसन जज ने आदेश दिया था और आईपीसी की धारा 193 के तहत उसके आवेदन पर गौर किया था वह राज्य के साथ साथ आपराधिक पुनरीक्षण का एक आवश्यक पक्षकार था। इसलिए पुनरीक्षण में राज्य के साथ साथ उसे प्रतिवादी के रूप में अभियोजित किया जाना चाहिए था।“
कोर्ट ने कहा कि हाई कोर्ट की दूसरी गलती थी सत्र न्यायाधीश को यह निर्देश देना कि वह आशीष और विमल की जमानत अर्जी पर गौर करे और उसे उसी दिन जमानत दे दे।”
न्यायमूर्ति सप्रे ने कहा, “हमारे विचार से हाई कोर्ट को यह अधिकार नहीं है कि वह सत्र अदालत को जमानत की अर्जी की अनुमति स्वीकार करने का आदेश दे। निश्चित रूप से एक बार जब इस तरह का निर्देश दे दिया जाता है तब सत्र न्यायाधीश के लिए इसके सिवा करने को क्या बचता है कि वह प्रतिवादी नंबर दो और तीन को हाई कोर्ट के निर्देश के अनुसार जमानत देने की बात मान ले। दूसरे शब्दों में, हाई कोर्ट द्वारा जारी निर्देश को आवश्यक रूप से मानते हुए उसके पास जमानत की अर्जी को स्वीकार करने के अलावा और कोई अधिकार नहीं था।”
बेंच ने आशीष और विमल दोनों से सुनवाई अदालत में आत्मसमर्पण करने को कहा जो कि उनकी जमानत याचिका पर मामले के गुण-दोष के आधार पर निर्णय करेगा।
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले पर गौर करते हुए कहा, “यहाँ तक कि निचली अदालत को कोई मामला सौंपने पर भी ऊंची अदालत निचली अदालत को जमानत ‘देने’ या ‘नहीं देने’ का निर्देश नहीं दे सकता। अगर इस तरह का कोई निर्देश जारी होता है तो इसका मतलब होगा उस कोर्ट के अधिकार को हथियाना और यह निचली अदालत के स्वनिर्णय के अधिकार में हस्तक्षेप होगा। इस तरह के आदेश, इसलिए, कानूनी रूप से टिक नहीं सकते। कोर्ट ने हाई कोर्ट के आदेश के उस हिस्से को निरस्त कर दिया जिसमें उसने सत्र अदालत को जमानत देने का आदेश दिया था।
न्यायमूर्ति सप्रे ने कहा, “दोनों ही मामलों – जमानत देने या इसे देने से मना करने में, सत्र न्यायाधीश को अपने स्वतंत्र न्यायिक विचार का प्रयोग करने और मामले के तथ्यों को ध्यान में रखते हुए जमानत देने या उससे इनकार करने पर लागू होने वाले वैधानिक सिद्धांतों के अनुरूप फैसला देना होता है। इस मामले में, एकल जज इस वैधानिक सिद्धांत को अपने ध्यान में रखने में चूक गया।”
सुप्रीम कोर्ट ने यह आदेश राजस्थान हाई कोर्ट के अप्रैल 28 के उस आदेश के खिलाफ दायर अपील पर दिया है जिसमें हाई कोर्ट ने आशीष मीणा और विमल मीणा नामक दो लोगों के खिलाफ सत्र अदालत द्वारा जारी गैर जमानती वारंट को निरस्त कर दिया था।
यह मामला 2014 में मदन मोहन द्वारा दायर एक एफआईआर से जुड़ा है। मदन मोहन ने ही सुप्रीम कोर्ट में अपील भी दायर की है।
दो आरोपी विमलेश कुमार और जनक सिंह आईपीसी की धारा 120(B), 363, 366, 368, 370(4) और 376 (पीओसीएसओ अधिनियम की धारा 3/4 और 16/17 के साथ इसे पढ़ें) के तहत मामले दायर किए गए थे। यह मामला सवाई माधोपुर के जिला और सत्र न्यायाधीश के पास लंबित है।
मदन मोहन ने सत्र न्यायालय में आईपीसी की धारा 193 के तहत एक शिकायत दायर की थी। उसने शिकायत की थी कि यद्यपि आशीष मीणा और विमल मीणा का नाम चार्जशीट के साथ दाखिल अन्य सभी दस्तावेजों में प्रमुखता से शामिल है, पर चार्जशीट से उनके नाम गायब थे जबकि विमलेश और जनक सिंह के नाम उसमें बचे रहे जिन पर मुकदमा चला।
उन्होंने अपील की कि आशीष और विमल पर भी मुकदमा चलाया जाए।
सत्र न्यायाधीश ने 19 नवंबर 2016 को उसके आवेदन पर कार्रवाई करते हुए आशीष और विमल को गिरफ्तार करने के लिए उनके खिलाफ गैर जमानती वारंट जारी किया।
आशीष और विमल ने राजस्थान हाई कोर्ट में आपराधिक पुनरीक्षण याचिका दायर की पर मदन मोहन को एक पक्षकार के रूप में अभियोजित किया गया।
उनकी पुनरीक्षण याचिका पर सुनवाई करते हुए हाई कोर्ट ने सत्र अदालत के फैसले के उस हिस्से को निरस्त कर दिया जिसमें उनके खिलाफ गैर जमानती वारंट जारी किया गया था।
इसके बाद हाई कोर्ट ने आशीष और विमल को निर्देश दिया कि वे सुनवाई अदालत में आत्मसमर्पण कर दें और नियमित जमानत के लिए आवेदन करे और जिस पर अदालत उसी दिन गौर करेगा जिस दिन उसके लिए आवेदन किया जाएगा।
इस आदेश के खिलाफ मदन मोहन की अपील पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा, “एकल जज ने न्यायिक विचार को तरजीह दिए बिना यह आदेश दिया और ऐसा करते हुए उसने कम से कम दो भारी गलतियां की।”
कोर्ट ने कहा, “पहला, वह यह नहीं देख पाया कि जिस व्यक्ति की शिकायत पर सेसन जज ने आदेश दिया था और आईपीसी की धारा 193 के तहत उसके आवेदन पर गौर किया था वह राज्य के साथ साथ आपराधिक पुनरीक्षण का एक आवश्यक पक्षकार था। इसलिए पुनरीक्षण में राज्य के साथ साथ उसे प्रतिवादी के रूप में अभियोजित किया जाना चाहिए था।“
कोर्ट ने कहा कि हाई कोर्ट की दूसरी गलती थी सत्र न्यायाधीश को यह निर्देश देना कि वह आशीष और विमल की जमानत अर्जी पर गौर करे और उसे उसी दिन जमानत दे दे।”
न्यायमूर्ति सप्रे ने कहा, “हमारे विचार से हाई कोर्ट को यह अधिकार नहीं है कि वह सत्र अदालत को जमानत की अर्जी की अनुमति स्वीकार करने का आदेश दे। निश्चित रूप से एक बार जब इस तरह का निर्देश दे दिया जाता है तब सत्र न्यायाधीश के लिए इसके सिवा करने को क्या बचता है कि वह प्रतिवादी नंबर दो और तीन को हाई कोर्ट के निर्देश के अनुसार जमानत देने की बात मान ले। दूसरे शब्दों में, हाई कोर्ट द्वारा जारी निर्देश को आवश्यक रूप से मानते हुए उसके पास जमानत की अर्जी को स्वीकार करने के अलावा और कोई अधिकार नहीं था।”
बेंच ने आशीष और विमल दोनों से सुनवाई अदालत में आत्मसमर्पण करने को कहा जो कि उनकी जमानत याचिका पर मामले के गुण-दोष के आधार पर निर्णय करेगा।
Thursday, 27 July 2017
अब दहेज का मामला दर्ज होते ही पुलिस नही कर सकती आरोपित को अरेस्ट
दहेज मामले में सुप्रीम कोर्ट ने जारी की बडी गाईड लाईन
झूठे दहेज केसों को लेकर शीर्ष अदालत ने जाहिर की चिंता
नई दिल्ली। देश में झूठे दहेज प्रकरणों की बढती संख्या को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने चिंता जाहिर की हैं।देश की शीर्ष अदालत ने ऐसे प्रकरणों की प्राथमिक जांच के बाद ही किसी की गिरफ्तारी करने को कहा हैं।सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि गिरफ्तारी करते वक्त पुलिस को वजह बतानी होगी। सुप्रीम कोर्ट ने दहेज केस में पुलिस अधिकारी के पास तुरंत गिरफ्तारी की शक्ति को भ्रष्टाचार का बड़ा स्रोत माना है। कोर्ट के आदेश के बाद अब दहेज केस में किसी को गिरफ्तार करने के लिए पुलिस को पहले केस डायरी में वजह दर्ज करनी होगी। जिनकी मजिस्ट्रेट समीक्षा करेंगे।
कोर्ट से सभी राज्य सरकारों को आदेश पर अमल करने को कहा है। कोर्ट के आदेश पर अमल नहीं करने वाले पुलिस अधिकारियों पर विभागीय कार्रवाई और अदालत की अवमानना की कार्रवाई संभव है। अब आपको सुनाते हैं कि अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने क्या लिखा है- पिछले कुछ सालों में दहेज विरोधी कानून के नाम पर परेशान करने के मामले लगातार बढ़ रहे हैं। सच ये है कि अनुच्छेद 498। संज्ञेय और गैरजमानती अपराध है। जिसका इस्तेमाल सुरक्षा की जगह नाराज पत्नियों द्वारा हथियार की तरह किया जा रहा है। इस कानून के तहत पति और उनके रिश्तेदारों की गिरफ्तारी परेशान करने का सबसे सरल तरीका है। कई मामलों में तो पतियों के दादा-दादी और दशकों से विदेश में रह रहीं उनकी बहनों की भी गिरफ्तारी देखी गई है।
दो सदस्यीय बेंच ने राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो का हवाला देते हुए लिखा है कि अनुच्छेद 498 । के तहत 2012 में करीब 2 लाख लोगों की गिरफ्तारी हुई जो कि 2011 के मुकाबले 9.4 फीसदी ज्यादा है। 2012 में जितनी गिरफ्तारी हुई उनमें से लगभग एक चैथाई महिलाएं थीं। अनुच्छेद 498। में चार्जशीट की दर 93.6 फीसदी है जबकि सजा की दर 15 फीसदी है जो काफी कम है। फिलहाल 3 लाख 72 हजार 706 केस की सुनवाई चल रही है, लगभग 3 लाख 17 हजार मुकदमों में आरोपियों की रिहाई की संभावना है। इन आंकड़ों को देखते हुए लगता है कि इस कानून का इस्तेमाल पति और उनके रिश्तेदारों को परेशान करने के लिए हथियार के तौर पर किया जा रहा है।
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